तुम्हारे कानों पर सफ़ेद एक मोती चमकता है
ठंडी होती है तासीर मोती की
मेरी आँखों पर रख दो कभी, ये जलती बहुत हैं।
तुम काजल भी तो लगाती हो न अक्सर ही
मुझसे ले लिया करो कभी, मेरे दिल में कालिख़ बहुत है।
मुलायम मालूम होती है उंगलियाँ तुम्हारी काफ़ी,
फ़ेर दो इक रोज़ इन्हें ही होटों पर,
ये एक अरसे से रूखे से बहुत हैं।
तुम्हारी कलाई में लचक भी तो है हमेशा से,
नाज़ुक है नज़ाकत भी है इनमें,
उधार दे सकती हो क्या ये सब?
घिस घिस कर थक चला है, बदन में मेरे एंठन बहुत है।
और कुछ चमकीली चूड़ियाँ डाल लो इनमें,
तुम पर सजेगी खनक इनकी-
मेरे मन में तो एकाकी बजती है और खटकती बहुत है।
तुम कपड़े रंगीन पहनती हो, चमकीले चटकीले भी,
कभी यूँ ही जी करे दिख-मिल भी लो,
इस शहर में जहाँ मैं हूँ, सफ़ेद फीकी फैली धुंध बहुत है।
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