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हमने ना हाफ़िज़ से बिगाड़ी है, न ही शैतान से कभी; दिन को मस्जिद में रहते हैं, रात को मैखानों में|

Tuesday, 4 November 2014

लेखक

जो आप मुझे लेखक समझ रहे हैं, धन्यवाद। मगर मेरी हैसियत क्या है यह आपको शरद जोशी का लिखा पढ़ के साफ़ हो जाएगा-
अपने विषय में मुझे कोई मीठा भ्रम नहीं हैं. यों भी हिंदी-जगत में लेखक को अपने बारे में खुशफहमियां बुढ़ापे में पैदा होती हैं. जवानी में बन जाती हैं तो बुढ़ापे में विकसित हो जाती हैं. ये भ्रम कि मैंने हिंदी को दिशा प्रदान करने के लिए जन्मा हूँ, मेरे नाम से एक युग संबोधित होगा और मैं छा जाऊंगा आदि मुझे नहीं हैं और न रहेंगे. यह नम्रता नहीं, सच बात है कि हिंदी के वर्तमान ग्रुप फोटो में मैं बिलकुल पिछली पंक्ति में (बाएं से तीसरा) खड़ा हूँ, गर्दन ऊँचे कर दूसरों के कन्धों के बीच कहीं झांक रहा हूँ. चित्र देखने वाले के लिए मुझे जानना अनिवार्य नहीं है. मेरी कोई रचना ऐसी नहीं जिस पर बातचीत कि जा सके. फिलहाल मुझसे उम्मीद करना भी बेकार है. इसका यह अर्थ भी नहीं कि मैं किसी हीन भावना से पीड़ित हूँ. जब मौका लगता है रोब मार लेता हूँ, प्रायः नयी स्कीमें गढता हूँ, रोज कोई संकल्प लेता हूँ पर वास्तविकता यह है कि मुझमेआलस और अक्षमता का ऐसा मधुर सम्मिश्रण कलात्मक अनुपात में हुआ है कि स्कीम तजना और संकल्प भुलाना मेरी आदत हो गई है. मुझे आशीष देने वालों ने प्रायः धोखा खाया है और मुझे वाह वाह करने वाले बोर हुए हैं. लिख रहा हूँ इस उम्मीद में कि एक दिन मीडियोकरी रंग लाएगी और साहित्य के लिए सिरदर्द बनेगी. इधर कुछ वर्षों में मैंने लेखन को गंभीरतापूर्वक अपनाने कि सोची है. कुछ छोटी-छोटी रचनाएँ मैंने लिखी हैं, पर वे कोई खास नहीं हैं. मुझे खुद वे नापसंद हैं. मुझे ठीक से लिखना नहीं आता. मुझे न आलोचकों ने सम्मान दिया, न रद्दी बेचने वालों ने, क्योंकि न मैंने अच्छा लिखा, न ज्यादा लिखा.

काल कोठरी

तुम्हारे कानों पर सफ़ेद एक मोती चमकता है
ठंडी होती है तासीर मोती की
मेरी आँखों पर रख दो कभी, ये जलती बहुत हैं।
तुम काजल भी तो लगाती हो न अक्सर ही
मुझसे ले लिया करो कभी, मेरे दिल में कालिख़ बहुत है।
मुलायम मालूम होती है उंगलियाँ तुम्हारी काफ़ी,
फ़ेर दो इक रोज़ इन्हें ही होटों पर,
ये एक अरसे से रूखे से बहुत हैं।
तुम्हारी कलाई में लचक भी तो है हमेशा से,
नाज़ुक है नज़ाकत भी है इनमें,
उधार दे सकती हो क्या ये सब?
घिस घिस कर थक चला है, बदन में मेरे एंठन बहुत है।
और कुछ चमकीली चूड़ियाँ डाल लो इनमें,
तुम पर सजेगी खनक इनकी-
मेरे मन में तो एकाकी बजती है और खटकती बहुत है।
तुम कपड़े रंगीन पहनती हो, चमकीले चटकीले भी,
कभी यूँ ही जी करे दिख-मिल भी लो,
इस शहर में जहाँ मैं हूँ, सफ़ेद फीकी फैली धुंध बहुत है।